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परिचय

 नाम -इंजी. अवधेश कुमार सक्सेना पिता का नाम- स्व.श्री मुरारी लाल सक्सेना शैक्षणिक योग्यता - DCE(Hons.),B.E.(Civil), MA ( Sociology), LL.B., ...

Saturday, May 30, 2020

फूल तो खिला नहीं

ग़ज़ल
फूल तो खिला नहीं ।

मुझे जो खींच ले महक वो फूल तो खिला नहीं ।
कठिन जिसे हो जीतना कहीं बना किला नहीं ।

पसंद जो नहीं वही मुझे मिला जहान में,
जिसे मैं चाहता रहा कभी मुझे मिला नहीं ।

हजार दुश्मनों ने दम लगा लिया बहुत मगर,
पहाड़ सा खड़ा रहा कभी ज़रा हिला नहीं ।

गिलास भर शराब पी नशा बहुत चढ़ा इसे, 
हुआ खराब हाल है तू और अब पिला नहीं ।

मैंने किया है प्यार तो न और कुछ भी चाहिए,
मिलो अगर कभी नहीं मुझे कोई गिला नहीं ।

अवधेश-24052020

तुझ से आशा पाली है हास्य रचना

हास्य व्यंग्य रचना है । 
तुझ से आशा पाली है ।

मीठी बातें करती वो, दिखती भोली भाली है ।
सूरत जिसकी गोरी है, मंशा उसकी  काली है ।
कैसी वो बातें करते, सुनकर होता है अचरज,
ज्ञानी वो बन जाते हैं, जिनकी डिग्री जाली है ।
घर में हैं बंदी जैसे, भाजी से रोटी खाते,
बाहर जाना है मुश्किल, जेलर तो घरवाली है ।
बागों की रौनक गायब, सब कुछ लगता है उजड़ा,
खिलने वाले फूलों को, मसले खुद अब माली है ।
कहते हम अच्छी बातें,जिनमें उनका ही हित हो,
पर ऐसा लगता उनको, दे दी जैसे गाली है ।
छेड़ा-छाड़ी वो करते, जोरों से सब पर हँसते,
रिश्ता हो ऐसा जैसे, जनता उनकी साली है ।
उम्मीदें उनसे रखना,छोड़ो अब क्या है रक्खा,
वो क्या दे सकते हमको,जिनका डब्बा खाली है ।
खोले हैं अब मयखाने,पैसा इनसे ही मिलता, 
पीने वालों का क्या है,गिरने उनको नाली है ।
इनकी झूठी बातें भी, मानी सच ही हैं जाती,
जय-जय करती है जनता, आदत ऐसी डाली है ।
मजदूरों की हालत अब, कैसे सुधरे बोलो तो,
सब्जी रोटी को तरसे, खाली-खाली थाली है ।
सत्ता से बाहर हैं जो, लगते  वो सूखे सूखे,
सत्ताधीशों को देखो, गालों पर क्या लाली है ।
भारत माता की जय हो, तेरा वैभव कम न हो, 
तेरे हर वासी ने अब, तुझ से आशा पाली है ।
ग़ज़लें लिख दीं ऐसी हमने,सबको खुश कर देंगीं ये,
पढ़ने सुनने वालों ने, जमकर ठोकी  ताली है ।

अवधेश-25052020

अकेली डगर से

ग़ज़ल 
अकेली डगर से ।

हुए तंग जब वो कबूतर बसर से ।
उड़े दूर वो फ़िर पुराने शज़र से ।

मिटाने सभी को वो शैतान आया,
जहाँ को बचा लो ख़ुदाया क़हर से ।

रहें चाँद सूरज अगर साथ मेरे,
तिमिर भाग जाए पलों में इधर से ।

नदी प्यार की हम बहाते रहेंगे,
भले नफ़रतें ही मिलेंगी उधर से ।

बड़े ही मजे से गुजर हो रही थी,
मुसीबत बुलायी न जाने किधर से ।

निकल कर घरों से जहाँ जा रहे हो,
बचोगे वहाँ क्या वबा के असर से ।

कभी तो पकड़ के तुम्हें बाँध लेंगे,
छुपोगे कहाँ तक हमारी नज़र से ।

सभी के दिलों में भरी है लबालब,
खुदा नफ़रतों के बचाना ज़हर से ।

कभी दूर घर से नहीं काम करना, 
मिला ये सबक है अभी के सफ़र से ।

चलेंगे नहीं हम कभी भी अकेले,
लगेगा हमें डर अकेली डगर से ।

अवधेश-25052020
ग़ज़ल
गरीबी तुम मिटाओ 

हमेशा फ़र्ज़ अपना तुम निभाओ ।
गरीबों की गरीबी तुम मिटाओ ।

हुयी बारिश भरा पानी गली में,
चलो इक नाव कागज़ की बनाओ ।

तुम्हारी बात जो सुनते नहीं हैं,
उन्हें जम कर खरी खोटी सुनाओ ।

उखाड़ो पौध नफरत की यहाँ से,
मुहब्बत की फसल हर सूँ उगाओ ।

अगर कुछ काम करना चाहते हो,
हसीनों से कभी दिल मत लगाओ ।

क़लम के जो सिपाही सो रहे हैं,
उन्हें मुश्किल घड़ी में तुम जगाओ ।

करो सेवा हमेशा दूसरों की,
किसी को भी कभी तुम मत सताओ ।

सियासत तो बड़ी गंदी हुयी है,
सियासतदान से भारत बचाओ ।

बहुत तुमने डराया लाठियों से,
हमें अब भभकियों से मत डराओ ।
अवधेश-26052020
पञ्चचामर छंद में एक रचना

बढ़ा चला जवान है 
शहीद देश पे हुआ, वही बना महान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
उठो चलो रुको नहीं, जवान जागते रहो ।
किसान खेत में चलो, मचान तानते रहो ।
पसीजता रहे यहाँ, वही महा किसान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
सवाल जो करे नहीं, गरीब वो कहाँ रहे ।
कहो उसे कहाँ रहे,  वहाँ रहे यहाँ रहे ।
गरीब के लिए अभी, यहाँ बना मकान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
अराति घात जो करे, उसे कड़ा जवाब दो ।
कठोरता बनी रहे, उसे सही हिसाब दो ।
मिसाइलें रखीं यहाँ, मिराज सा विमान है।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
चलो वहाँ कली खिले, खिले जहाँ बहार है ।
रहो जहाँ खुशी मिले, कहो ज़रा कि प्यार है ।
बहार और प्यार से, भरा हुआ जहान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
उसे न भूख प्यास है, तना हुआ खड़ा रहे ।
हजार गोलियाँ चलें, अडिग वो अड़ा रहे ।
जवान वीर से बनी, सदैव देश शान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
चली चली हवा चली, चिड़ी उड़ी गली गली,
दबी दबी नहीं रही, बड़े सुखों रही पली ।
खुला खुला सभी दिशा विशाल आसमान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
पुकारके सुभारती, सुना रही कथा हमें ।
चलो सुनें उसे अभी, बता रही व्यथा हमें ।
दुखी कभी रहे न माँ, वही हमार जान है ।
महान देश के लिए, बढ़ा चला जवान है ।
अवधेश-28052020
दोहा-

पानी सींचे पेड़ को, लकड़ी नहीं डुबाए ।

बच्चों को पाले पिता, विपदा दूर भगाए ।

अवधेश -30052020

Tuesday, May 26, 2020

संस्मरण /लघुकथा
खुशी

आज की ही बात है मैं अपनी छत पर टहल रहा था, मेरी नज़र घर के पीछे के खाली मैदान में लगभग 150 मीटर दूरी पर एक कचरा बीनने वाले लड़के पर चली गयी, वो अपने एक हाथ में एक प्लास्टिक का खाली कट्टा लिए था और दूसरे हाथ से यहाँ-वहाँ बिखरे कचरे में से कुछ उठाता, देखता और किसी चीज को कट्टे में डालता और किसी चीज को वापिस फेंक देता । दूसरे घरों के पीछे से इसी तरह प्लास्टिक या लोहे की छोटी छोटी चीजें वो अपने कट्टे में डालता हुआ मेरे घर के पीछे की तरफ आ रहा था ।
मैं सोचने लगा कि ये जिन चीजों को उठाने के लिए झुकता है फिर उठाकर कट्टे में डालता है उनके वजन के हिसाब से एक बार झुकने, उठाने, कट्टे में डालने और आगे बढ़ने में इसको मुश्किल से 50 पैसे की चीज मिल पाती होगी यानि दिन भर भी अगर ये काम करेगा तो ज्यादा से ज्यादा 100 रुपये इसे मिल पाते होंगे । आजकल कचरा गाड़ी गली-गली में आती हैं तो बैसे भी कचरा घर के बाहर डालना बंद हो गया है और कुछ लोग तो प्लास्टिक और लोहे की छोटी- छोटी चीजों को इकट्ठा करके कबाड़ी वालों को बेचते हैं । टहलते हुए और ये सब विचार करते हुए मुझे छत पर ही एक प्लास्टिक की पुरानी बाल्टी दिखी, मैंने सोचा कि ये बाल्टी अब पुरानी हो गयी है और कुछ ही दिन बाद बदलनी ही पड़ेगी, ये विचार आते ही मैंने प्लास्टिक की वो बाल्टी छत से घर के पीछे इस तरह से फेंकी कि वो लड़का मुझे फेंकते हुए न देखे । मैं दूसरे घरों के पीछे से उसे अपने घर के पीछे बढ़ते हुए अपनी छत से ही इस तरह देख रहा था कि उसकी निगाह मुझ पर न पड़े । मैंने देखा कि कचरा बीनने वाला वो लड़का जब मेरे घर के पीछे आया और उसकी नजर उस प्लास्टिक की बाल्टी पर पड़ी तो उसके कदम थोड़े तेज हो गए, उसने प्लास्टिक की बाल्टी को पैर से तोड़ा और उसके टुकड़ों को कट्टे में रख लिया । मैं उसे देख रहा था, उसकी बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के भाव से उसको मिली खुशी बता रही थी कि एक बार की मेहनत में 50 पैसे  की जगह अगर 5 रुपये मिल जाएं तो कितनी खुशी होती है ।
उसकी खुशी देखकर मुझे भी खुशी हो रही थी, ये खुशियां ऐसे ही फैलती रहें ।
अवधेश-27052020