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परिचय

 नाम -इंजी. अवधेश कुमार सक्सेना पिता का नाम- स्व.श्री मुरारी लाल सक्सेना शैक्षणिक योग्यता - DCE(Hons.),B.E.(Civil), MA ( Sociology), LL.B., ...

Saturday, July 4, 2020

संस्मरण जा पर कृपा राम की

संस्मरण
जा पर कृपा राम की 
माँ को जब भी कहीं जाना होता था, मुझे साथ ले जाती थीं, पिता के देहांत के बाद हम दो भाई की परवरिश में माँ दिन रात मेहनत करती थीं । उस दिन माँ को घर के लिए कुछ जरूरी सामान बाजार से लाना था, माँ और मैं बाज़ार गए थे । बड़े भाई अपने काम पर निकल गए थे । घर सूना था लेकिन हम लोगों को घर की कोई चिंता नहीं रहती थी क्योंकि मोहल्ले में कभी चोरी या लूटपाट जैसी घटनाएं तब नहीं होती थीं । हम माँ बेटे सामान लेकर घर लौट रहे थे, करीब 3-4 किलोमीटर पैदल चले थे तो घर पहुँचने की जल्दी थी, मुझे भूख भी लगी थी, उस समय मेरी उम्र लगभग 10 साल थी । घर पहुँचने ही वाले थे कि घर के बाहर  भीड़ नजर आयी, थोड़ा और पास पहुँचे तो  घर में आग की लपटें और धुँआ देखकर चीख निकल गयी, माँ कह रही थी- है भगवान, ये क्या हो गया  । कुछ लोग पानी की बल्टियाँ घर पर डाल रहे थे, हम घर के अंदर की अपनी चीजों को बचाना चाहते थे, घर के अंदर जाने की कोशिश की, मगर  लोगों ने रोक लिया । घर के बिल्कुल पास में ही एक अच्छा कुँआ है जिसमें बारह महीने पानी रहता है, पूरा मोहल्ला अपनी रस्सी बाल्टियां लेकर कुँए पर मौजूद था, कुछ लोग पानी खींच रहे थे तो कुछ लोग बाल्टियों से पानी आग पर डाल रहे थे । माँ मुझे हिम्मत बंधा रही थीं । मैं माँ के लिए परेशान था । लगभग एक डेढ़ घण्टे के प्रयास  से लोगों ने आग बुझा दी । आग बुझाने वाले आसपास रहने वाले हमारे अधिकांश मुस्लिम भाई थे । सर्व धर्म सम भाव की शिक्षा मुझे बचपन से ही मिली है क्योंकि घर के पास मस्जिद और जैन मंदिर थे तो थोड़ी दूरी पर हिन्दू मंदिर भी थे, घर के पास रहने वालों में सभी मुस्लिम, जबकि मोहल्ले में हिन्दू, जैन, सिख और ईसाई परिवार भी रहते थे, मेरे बचपन के दोस्तों में मुस्लिम, सिख, ईसाई और  जैन भी शामिल हैं । आग बुझ गयी थी लेकिन सामान कुछ नहीं बचा था, ईश्वर की कृपा थी कि हम तीनों सुरक्षित थे । दीवालों के ऊपर लकड़ी की म्यार  और म्यार के ऊपर लकड़ियां, लकड़ियों के ऊपर पत्थर के पाट रखकर पटोर बनती है, पटोर के पाट और लकड़ियां सब जल चुके थे ।
जो औरत अपने पति के जाने का दुख भुगत चुकी हो, जिन बेटों ने अपने पिता का साया उठने का दुख सह लिया हो, उन्हें अन्य कोई मुसीबत क्या परेशान करेगी । माँ और दोनों बेटे जुट गए अपने घर को बनाने में और कुछ ही दिनों के परिश्रम से घर को फिर से रहने के लिए तैयार कर लिया । वो घर वो कुँआ वो पड़ोसी हमेशा याद रहते हैं । उस घर में माँ के नाम से बनी समिति द्वारा संचालित स्कूल चलता है जिसमें वर्तमान में भी मात्र तीन सौ रुपये प्रति माह फीस ली जाती है और लगभग  आधे बच्चों की इससे भी आधी फीस ली जाती है । 

घर में आग लगने की एक और घटना-

अब हम जिस घर में रहते हैं, उसके आसपास कोई मुस्लिम, सिख, जैन, ईसाई नहीं रहता, सभी एक धर्म को मानने वाले लोग हैं ।
3 साल पहले की घटना है, रात को 3 बजे बहुत जोर की आवाज से नींद खुली खिड़की के कांच से बाहर खम्बे पर आग जलती दिखी, लाइट चली गयी थी, मैं, पत्नी, छोटा बेटा और बेटी जाग गए थे, बड़ा बेटा दिल्ली में अपनी upsc सिविल सर्विस परीक्षा की  तैयारी कर रहा था, इसलिये घर पर नहीं था । हम लोग घर की दूसरी मंजिल पर रहते हैं, नीचे ड्राइंग रूम और स्टोर रूम हैं । मैंने बॉलकनी में आकर देखा तो नीचे की गैलरी से धुँआ निकल रहा था, मैं समझ गया कि नीचे भी आग लग चुकी है । मैंने पत्नी और बच्चों को जल्दी से बाहर निकाल कर घर के बाहर बिठाया, नीचे की गैलरी बाहर से खोली तो मीटर के बोर्ड और आस पास आग लगी हुई थी, गैलरी में  धुँआ भरा हुआ था, गैलरी के दरवाजे के रोशनदान का कांच निकाला तो धुँआ बाहर निकलना शुरू हुआ । घर से बाहर नल है उसमें लेजम लगाकर पानी से आग बुझाने के लिए लेजम गैलरी के अंदर से लानी थी, बेटा झुका हुआ अंदर से लेजम लेकर आया, बिजली की केबल में करेंट न हो इसका डर था । सामने रहने वाले परिवार का एक लड़का उसके घर से सब देख रहा था, मेरे बालकनी में निकलने के पहले से ही वो उसके घर की बाउंड्री पर अंदर खड़ा था । 
अन्य घरों के लोग घरों के अंदर ही थे । मैंने बिजली विभाग के  स्थानीय चाबी घर पर कई बार फोन किया किसी ने फोन नहीं उठाया । 
लेजम से डरते-डरते मैंने पानी से आग बुझाई,  केबल खंबे पर भी जल चुकी थी, इसलिए करेंट नहीं था । मैं अपने वाहन से चाबी घर गया तो वहाँ अंदर से ताला लगा था, किसी ने ताला नहीं खोला बहुत आवाजें लगाईं । बाहर से जाने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि ये लोग चौराहे पर 5 बजे चाय की दुकान पर चाय पीने जाते हैं । तब 4 बजे थे, मैं वापिस आ गया, धुँआ अभी भी निकल रहा था, बेटे को मैंने पानी डालने से मना कर दिया था । मैंने फिर सावधानी स लेजम को पकड़ कर आग पर पानी डाला । धुँआ कम हो गया, 5 बजे मैं उस चाय की दुकान पर पहुँचा तो बिजली कर्मचारी मिल गए, अपनी समस्या बताई तो वो वोले कि आपको हेल्पलाइन नम्बर पर कम्प्लेंट दर्ज करानी होगी, उनसे हेल्पलाइन नम्बर लेकर कम्प्लेंट दर्ज कराई तो उनका नसेनी वाला वाहन न होने से वो आने को तैयार नहीं थे, मैं निवेदन करके अपने वाहन से उन्हें लाया कि कम से कम केबल का हिस्सा तो घर से दूर कर दें ।
उन्होंने केबल अलग कर दी, खम्बे पर देखा तो उन्होंने बताया कि केबल खम्बे पर जलकर अलग हो चुकी है ।
दूसरे दिन लाइट चालू हो सकी ।
खम्बे के नीचे मैंने देखा तो मुझे एक लकड़ी के टुकड़े में जली हुई मशाल जैसी मिली, किसी ने लंबे बांस में आगे लकड़ी का टुकड़ा बांध कर पॉलीथिन लपेट कर केबल में आग लगाई थी । कोशिश शायद केवल लाइट बंद करने की रही हो, पर घर में आग लगने पर शायद उस शरारती तत्व को और अधिक खुशी मिली हो । ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे कि ये खुशी असली खुशी नहीं होती, असली खुशी तो दूसरों की मदद करने पर मिलती है । ईश्वर की कृपा से हम दूसरों की मदद के लिए हाथ बढ़ा पाते हैं और हमें वो असली खुशी मिलती रहती है ।
जा पर कृपा राम की होई ।
ता पर कृपा करें सब कोई ।

अवधेश सक्सेना- 05072020
शिवपुरी मध्य प्रदेश

कहमुक़री

कहमुक़री

रुतबा मुझ पर झाड़ा करता 
गुस्सा हर पल मुख से झरता
बन ठन के वो जाता दफ़्तर ।
क्या सखि साजन ? ना सखि अफसर ।

अवधेश सक्सेना-04072020
शिवपुरी मध्य प्रदेश

Friday, July 3, 2020

प्रियामृतावधेश

मेरी मौलिक विधा #प्रियामृतावधेश में एक कविता 

विधान- पंक्तियों में 
बढ़ते क्रम में मात्राएं 
2,4,6,8,10,12,14,16,18
घटते क्रम में मात्राएं 
18,16,14,12,10,8,6,4,2
18 मात्राओं वाली पंक्तियां सम तुकांत
शुरू और आखिरी की 2 मात्राओं वाली पंक्तियां सम तुकांत ।
मन के किसी भाव के आते ही उसे लिखने के लिए ये अच्छी विधा है । 
इस विधा में अभ्यास करें, अच्छा लगेगा ।

#प्रियामृतावधेश 
#मंज़िल_पाना_है ।

कल
जो था
आज नहीं
अभी जो पास 
कल रहेगा नहीं 
दुख जाता सुख आता
सुख भी कहाँ ठहर पाता
जीवन सुख दुख का पहिया है
कठिन राह पर  बढ़ते   जाना   है ।
हमें   आख़िरी   मंज़िल  पाना  है ।
समय बदलता जगह बदलती
सुई घड़ी की बस चलती 
समय नहीं रुकता है
हमसे कहता है
संग-संग चल 
गँवा नहीं 
कोई
पल

अवधेश सक्सेना- 03072020
शिवपुरी मध्य प्रदेश

Thursday, July 2, 2020

1 जुलाई 2020 के ऑनलाइन कवि सम्मेलन में सम्मिलित रचनाकार


कवि सम्मेलन का समाचार

पिता से शान है घर की, पिता से मान है घर का- मुरारी लाल'मानव' अखिल भारतीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन में 20 कवियों ने काव्य रस बरसाया । शिवपुरी / / भारतीय सृजन संस्थान शिवपुरी के आमंत्रण पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 20 कवियों ने गत दिवस काव्य रस की वर्षा करते हुए श्रृंगार, ओज, देश भक्ति, प्रकृति प्रेम और हास्य व्यंग्य की रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया । गत दिवस शाम 6 बजे शुरू हुआ कवि सम्मेलन रात 10 बजे तक चलता रहा । भारतीय सृजन संस्थान के अध्यक्ष अवधेश सक्सेना ने अत्यंत प्रभावी ढंग से पटल का संचालन करते हुए आमंत्रित कवियों का सम्मान किया और रचना पाठ के लिए पूर्व निर्धारित क्रम से ससम्मान आमंत्रित किया । सरस्वती वंदना का मधुर वाणी से गायन पिछोर की कवियत्री डॉ परवीन महमूद ने किया । बाराबंकी उत्तर प्रदेश के कवि सुशील कुमार यादव ने एक गीत सुनाया दिल का सौदा करके तुमसे ये अनमोल समय न खोते, काश सदा अजनबी ही होते । कानपुर से श्रीमती दीपांजलि दुबे ने छंद मुक्त रचना सुनाते हुए कहा कि राहें ही मंजिल पर ले जातीं, सोच समझ कर बढ़ आगे । दिल्ली की श्रीमती रुचिका सक्सेना ने अपनी मधुर वाणी और मनमोहक अंदाज़ में सुनाया कि खो देने का डर कैसा, मिल जाए तो बिछड़ने का डर कैसा । अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश से सर्वेश उपाध्याय ने देशभक्ति का गीत प्रस्तुत किया इस देश के हालात पर है मन ये रो रहा । वो कौन है जो नफ़रतों के बीज वो रहा । ग्वालियर से श्रीमती पुष्पा मिश्रा ने अपनी कविता कुछ इस प्रकार सुनाई हृदय में प्रेम रस बहता उसी को गुनगुनाती हूँ । ग्वालियर से ही श्रीमती पुष्पा शर्मा की पंक्तियां देखिए इस पथ का उद्देश्य नहीं है, शांत भवन में टिक रहना, जाना है उस मंजिल तक जिसके आगे राह नहीं । विदिशा के धरम सिंह ने सुनाया आज मुझसे कुछ यूँ कहने लगा था आईना, देख कर आँसू मेरे बहने लगा था आईना । आलम पुर भिंड से कु. नेहा सोनी ने माटी और देशभक्ति की शानदार रचना प्रस्तुत की राष्ट्र की समस्यायों का कुछ भार ढोना चाहिए । सागर की डॉ नमृता फुसकेले ने नारी विषय पर कविता पढ़ी नारी तुम जीवन का नया पाठ पढ़ाती हो । भिंड से नीलम सोनी जी ने सुंदर कविता पाठ किया जीवन को सार्थक बनाना है । जबलपर से राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका कु.चंदा देवी स्वर्णकार ने बेटियों का महत्व रेखांकित करती हुई कविता सृष्टि के आधार स्तंभ बेटियां तो फिर बेटी क्यों । प्रतापगढ़ राजस्थान से कमलेश शर्मा कमल ने सुंदर गीत के माध्यम से दुश्मन को ललकारा, दुश्मन देश के सुन ले मेरी छोटी सी ललकार, थाम ले अपने कदम नहीं तो खाएगा फिर मार । एटा उत्तर प्रदेश के मुरारी लाल मानव ने अपने मुक्तक सुनाए पिता से शान है घर की, पिता से मान घर का है, पिता संतान की ताकत पिता अरमान घर का है । इंजी. शंभु सिंह रघुवंशी अजेय गुना ने व्यंग्य रचना पढ़ कर सुनाई हम गधे को घोड़ा बना रहे हैं, सब इसको साबुन लगा रहे हैं । पिछोर शिवपुरी की डॉ परवीन महमूद ने मधुर कंठ से गाया अपने नाम के पहले लिख दे तू भी मेरा नाम, मैं तेरी राधे बन जाऊं तू मेरा घनश्याम । दिल्ली की श्रीमती सुदर्शन शर्मा ने प्रेम को परिभाषित करती हुई रचना सुनाई चालीस पचास पार की औरतें यदि लिखतीं है प्रेम तो कोई क्यों ढूंढे उनमें मसाला । लखनऊ की श्रीमती निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी' ने एक भावपूर्ण सुंदर प्रस्तुति पौधे में एक गमला उग आए उल्टी गंगा बह आए, से श्रोताओं की प्रशंसा बटोरी । पटल के आग्रह पर संचालन कर रहे संस्थान के अध्यक्ष अवधेश सक्सेना ने अपनी ग़ज़ल सुनाई - ख़्वाब तू माँ बाप के साकार कर, प्यार उनसे है अगर इज़हार कर । चाहता लिखना असर वाली ग़ज़ल, तेज अपनी तू कलम की धार कर । पटल पर सुनने वालों ने ग़ज़ल के हर शेर की जमकर तारीफ़ की । अंत में अध्यक्षता कर रहे जयपुर के राम किशोर वर्मा ने अपने कविता पाठ से कवि सम्मेलन की सफलता में चार चाँद लगा दिए । उनका दोहा देखें- फटे किसी दिल का नहीं, बोलें ऐसे बोल । सिल जाएं जो फट गए, वह वाणी अनमोल । अंत में श्योपुर के पण्डित सुरेंद्र शर्मा 'सागर ' ने सभी का आभार प्रकट किया । भारतीय साहित्य सृजन संस्थान शिवपुरी की ओर से इस ऑनलाइन अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी कवियों को उत्कृष्ट रचना पाठ करने पर अध्यक्ष अवधेश सक्सेना द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान किये गए ।

Wednesday, July 1, 2020

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ दूजा कोई है नहीं, किसका लोगे नाम । दर्शन प्रभु के जब करो, बनते बिगड़े काम । बनते बिगड़े काम, जपो प्रभु नामी माला । भजो कृष्ण का नाम,वही है तारन वाला । जल से कर अभिषेक,करो तुम शिव की पूजा । हर लें सारे कष्ट, नहीं है कोई दूजा । अवधेश-0272020